सुप्रीम कोर्ट को अनुच्छेद 142 के तहत विवाह को रद्द करने का अधिकार : संविधान पीठ
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- May 1, 2023
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सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने सोमवार को विवाह को रद्द करने से संबंधित अनुच्छेद 142 के तहत मिली शक्तियों के प्रयोग में एक महत्वपूर्ण आदेश पारित किया है।
कोर्ट ने माना कि वह अनुच्छेद 142 के तहत ‘विवाह जारी रहने के असंभव’ (Irretrievable Breakdown of Marriage) होने की स्थिति में सहमति देने वाले पक्षों को तलाक़ की डिक्री दे सकता है।
कोर्ट ने माना कि ऐसी स्थिति में हिंदू विवाह अधिनियम में लागू 6 माह की क़ानूनी बाध्यता भी ज़रूरी नहीं होगी।
जस्टिस संजय किशन कौल, जस्टिस संजीव खन्ना, जस्टिस अभय एस ओका, जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस जेके माहेश्वरी वाली संविधान पीठ ने यह आदेश पारित किया है।
कोर्ट दो दशकों से अधिक समय से अपरिवर्तनीय रूप से टूटे हुए विवाहों (Irretrievable Breakdown of Marriage) को रद्द करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी व्यापक शक्तियों का प्रयोग कर रही है।
ग़ौरतलब है कि कोर्ट पिछले साल सितंबर में इस बात पर विचार करने के लिए सहमत हो गई थी कि क्या वह दोनों भागीदारों की सहमति के बिना अलग रह रहे जोड़ों के बीच विवाह को रद्द कर सकती है या नहीं।
पांच जजों की संविधान पीठ ने इस मामले में सुनवाई के बाद 29 सितंबर 2022 को अपना आदेश सुरक्षित रखा था।
कोर्ट इस बात पर विचार कर रही थी कि ऐसे मामलों में जहाँ कोर्ट की राय में विवाह अपरिवर्तनीय रूप से टूट गया हो लेकिन एक पक्ष तलाक़ का विरोध कर रहा हो तो क्या अनुच्छेद 142 के तहत उसकी व्यापक शक्तियां किसी भी तरह से बाधित होती हैं।
संविधान के अनुच्छेद 142 का संबध सुप्रीम कोर्ट में लंबित किसी भी मामले में पूर्ण न्याय के लिए उसके आदेशों के प्रवर्तन से है।
पीठ के समक्ष दो मुद्दे विचारधीन थे पहला क्या ऐसे मामलों में अनुच्छेद 142 के तहत अधिकार का प्रयोग बिल्कुल नहीं किया जाना चाहिए या अनुच्छेद 142 का प्रयोग हर मामले के तथ्यों में निर्धारित करने के लिए छोड़ दिया जाना चाहिए।
पीठ के समक्ष दूसरा मुद्दा यह था कि सहमति देने वाले पक्षों को हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 13 B के तहत निर्धारित अनिवार्य अवधि की प्रतीक्षा के लिए परिवारिक न्यायालय को संदर्भित किये बिना उनके बीच विवाह को भंग करने के लिए अनुच्छेद 142 के तहत शक्तियों के प्रयोग के लिए व्यापक मानदंड क्या हो सकते हैं ?