नौ साल से जेल में बंद हत्या के दोषी को बॉम्बे हाई कोर्ट ने रिहा करने का दिया आदेश

नौ साल से जेल में बंद हत्या के दोषी को बॉम्बे हाई कोर्ट ने रिहा करने का दिया आदेश

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  • October 27, 2022
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बॉम्बे हाई कोर्ट ने पिछले सप्ताह अपने एक महत्वपूर्ण आदेश में निचली अदालत से आजीवन कारावास की सजा पाए एक दोषी को रिहा करने का आदेश दिया है।

जस्टिस ए एस गडकरी और जस्टिस मिलिन्द एन जाधव की पीठ ने 9 साल से तलोजा सेंट्रल जेल में बंद हत्या के अपराध में दोषी शिवदत्त उर्फ़ बिल्टू को रिहा करने का आदेश दिया है।

पीठ ने कहा कि अभियोजन दोषी द्वारा अपराध करने की परिस्थितियों को सिद्ध करने में विफल रहा है।

क्या है मामला ?

इस मामले में झारखण्ड निवासी भरत पंजियारा बांद्रा (पूर्व) में एक किराए के माकन में रहता था और पाव भाजी बेचता था। वह एक 18 सदस्यी बीसी (एक निजी धन पूलन योजना ) समिति का सदस्य था। 9 जुलाई 2013 को इस समिति ने अपना चक्र पूरा किया था और भरत को 51 हज़ार रुपए मिले थे। 15 जुलाई को बहादुर सिंह जो भरत को ब्रेड पहुंचाता था जब सुबह 6: 30 बजे भरत के घर पंहुचा तो उसने मकान से धुंआ उठते हुए देखा था। सिंह ने इसकी सुचना तुरंत भरत के मकान मालिक अजय सहा को दी थी जिसने भरत के कपड़ों को जला हुआ देखा था और उसका गला भी कटा हुआ था।

इस मामले में कोई चश्मदीद गवाह नहीं था लेकिन पुलिस का दावा था कि मकान मालिक अजय सहा को 14 जुलाई की रात 10 : 30 बजे भरत के साथ अंतिम बार देखा गया था।

बाद में खेरवाड़ी पुलिस ने जाँच के दौरान बिल्टू को हिरासत में लिया था। उसके पास से 65,300 रुपए बरामद हुए थे। उस पर आरोप था कि उसने पैसों के लिए भरत की हत्या कर दी थी। हालांकि बिल्टू ने आरोपों को नाकारा था।

बांद्रा की निचली अदालत में जाँच के बाद अपीलकर्ता -आरोपी के खिलाफ 23 अक्तूबर 2013 को आरोप पत्र दाखिल किया गया था।

अपीलकर्ता ने अपने खिलाफ सारे आरोपों को नाकारा था।

ट्रायल के बाद निचली अदालत ने अपीलकर्ता को दोषी पाया था और उसे आजीवन कारावास की सजा दी थी। निचली अदालत के इसी आदेश को अपीलकर्ता ने हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।

अपीलकर्ता का पक्ष –

अपीलकर्ता की ओर से अधिवक्ता मंदर सोमन का तर्क था कि अभियोजन मामले को उचित संदेहों से परे साबित करने में विफल रहा था।

अभियोजन के मामले में बहुत सारी असंगतियाँ थीं। परिस्थितियों की कड़ी अधूरी थी, और निचली अदालत ने अपीलकर्ता को ग़लत ढंग से दोषी ठहराया था।

प्रतिवादी का पक्ष –

अधिवक्ता एच जे ढेढ़िया का तर्क था कि मामले में एक गवाह का बयान था कि जब वह घटना की जगह पंहुचा तो भरत के पास मौजूद 51 हज़ार रुपए ग़ायब थे जो अभियोजन द्वारा अपराध के उद्देश्य को सिद्ध करता है। ढेढ़िया का कहना था कि अपीलकर्ता दोषी था और उसकी अपील को रद्द कर देना चाहिए।

पीठ ने कहा कि यह एक परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर आधारित मामला है। ऐसी हालत में परिस्थितियों में किसी असंभवता की गुंजाईश नहीं होनी चाहिए थी।

पीठ ने माना कि अभियोजन पक्ष इस तथ्य को साबित करने में नाकाम था कि जो रक़म बिल्टू के पास से बरामद हुई थी वह वही थी जो कथित तौर पर भरत के पास से गायब हुआ थी।

पीठ ने कहा कि कोई ठोस साक्ष्य ना होने पर यह नहीं कहा जा सकता कि इत्यधिक गरीबी के कारण बिल्टू अपराध करने और भरत के पैसे चुराने को मजबूर था, जबकि भरत के पास मौजूद रक़म और कथित रूप से बिल्टू से बरामद रक़म में स्पष्ट रूप से कोई मेल नहीं था। यह एक मज़बूत परिस्थिति है जिसे अभियोजन साबित करने में विफल रहा था।

कोर्ट ने माना कि अपीलकर्ता ने शुलभ शौचालय से पैसों की बरामदगी को अपने खिलाफ षड्यंत्र बताया था इस से भी इंकार नहीं किया जा सकता है।

कोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने संवत खान और अन्य बनाम स्टेट ऑफ़ राजस्थान में माना था कि केवल चोरी की गयी संपत्ति की बरामदगी से किसी आरोपी को हत्या का भी दोषी नहीं माना जा सकता है।

कोर्ट ने हनुमंत और अन्य बनाम स्टेट ऑफ़ मध्य प्रदेश का हवाला दिया जिसमे सुप्रीम कोर्ट का फैसला था कि परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के मामलों में निचली अदालतों का सही दृष्टिकोण सिर्फ इस बात पर केंद्रित होना चाहिए के सारे स्थापित तथ्य सिर्फ आरोपी के अपराध से सुसंगत हैं।

कोर्ट ने कहा कि शरद बिरदी चंद सारदा बनाम स्टेट ऑफ़ महाराष्ट्र, सूरजदेव महतो बनाम स्टेट ऑफ़ बिहार, जी पार्शवनाथ बनाम स्टेट ऑफ़ कर्नाटका में सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्थापित कानून और वर्तमान मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर चर्चा के बाद हमारी राय है कि अभियोजन उन परिस्थितियों को स्थापित करने में नाकाम रहा है जो अपीलकर्ता को अपराधी साबित करती हैं।

अभियोजन पक्ष अपीलकर्ता के खिलाफ सभी उचित संदेहों से परे आरोप सिद्ध करने में विफल रहा है, और इस तरह अपीलकर्ता संदेह का लाभ पाने का पात्र है।

केस टाइटल – शिवदत्त @ बिल्टू सुभोदचन्द्र साह बनाम स्टेट ऑफ़ महाराष्ट्र (Criminal Appeal No. 872 of 2015)

पूरा आदेश यहाँ पढ़ें –

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