“इस्लाम लिव इन रिलेशन को व्यभिचार के रूप में करता है परिभाषित” इलाहबाद हाई कोर्ट ने अंतर धार्मिक जोड़े को संरक्षण देने से किया इंकार
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- June 25, 2023
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इलाहाबाद हाई कोर्ट ने हाल ही में लिव इन रिलेशन से जुड़े एक मामले पर सुनवाई करते हुए कहा कि मुस्लिम क़ानून में विवाह से बहार यौन संबंध की मान्यता नहीं है।
जस्टिस संगीता चन्द्रा और जस्टिस नरेंद्र कुमार जौहरी की पीठ ने याचिका ख़ारिज करते हुए कहा कि इस्लाम विवाह पूर्व स्थापित यौन संबंध को मान्यता नहीं देता है।
दरअसल कोर्ट एक ऐसी याचिका की सुनवाई कर रहा था जिसमे एक हिन्दू महिला और मुस्लिम पुरुष ने कोर्ट से अपने लिव इन रिलेशन के लिए संरक्षण की मांग की थी।
याचिका में लिव इन रिलेशन में रह रहे जोड़े ने पुलिस उत्पीड़न के खिलाफ कोर्ट से संरक्षण दिए जाने की मांग की थी। महिला ने कोर्ट को बताया था कि इस रिश्ते से नाखुश उसकी माँ की शिकायत पर पुलिस याचिकाकर्ताओं को परेशान कर रही है।
हालांकि याचिकाकर्ताओं ने निकट भविष्य में विवाह करने की इच्छा व्यक्त नहीं की थी। जिस पर कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं से कहा कि मुस्लिम क़ानून विवाह से बाहर यौन संबंध स्थापित करने की अनुमति नहीं देता।
कोर्ट ने कहा था कि “पति और पत्नी के बीच बनाए गए यौन संबंध के अतिरिक्त किसी भी संभोग को इस्लाम ज़िना के रूप में परिभाषित करता है । इसमें विवाहेतर और विवाह पूर्व यौन संबंध दोनों शामिल हैं। जिसे अंग्रेजी भाषा में Fornication (व्यभिचार) के रूप में अनुवादित किया जाता है। इस्लाम में इस तरह के विवाह पूर्व यौन संबंध की इजाजत नहीं है। वास्तव में कोई भी यौन, वासनापूर्ण, स्नेहपूर्ण कार्य जैसे चुंबन, स्पर्श, घूरना आदि इन्हें “ज़िना” का भाग माना जाता है जो वास्तविक “ज़िना” की ओर ले जा सकता है। ऐसे अपराध के लिए यदि व्यभिचार करने वाला जोड़ा अविवाहित हो तो क़ुरान के अनुसार उसे 100 कोड़े की सजा दिए जाने का प्रावधान है जबकि विवाहित के लिए पत्थर से मार कर मौत की सजा है।”
केस टाइटल : किरण रावत व अन्य बनाम स्टेट ऑफ़ यू पी (Criminal Misc. Writ Petition No. – 3310 of 2023)
आदेश यहाँ पढ़ें –