दो बालिग़ लोगों के वैवाहिक जीवन में किसी को हस्तक्षेप का अधिकार नहीं: इलाहबाद हाई कोर्ट
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- October 21, 2022
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इलाहबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में कहा है कि दो बालिग लोगों की ज़िंदगी में किसी को हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है।
जस्टिस संजय कुमार सिंह की पीठ ने एक पति द्वारा दायर की गयी हैबियस कार्पस याचिका की सुनवाई में पति और पत्नी को साथ रहने का आदेश दिया है।
इस मामले में पत्नी ने कोर्ट के सामने पति के साथ सुखी वैवाहिक ज़िंदगी जीने की इच्छा ज़ाहिर की थी।
याची का दावा था कि उसकी पत्नी को उसके परिवार वालों ने ग़ैरक़ानूनी तरीके से बंधक बना रखा है, उसने पत्नी को कोर्ट के सामने पेश होने की मांग की थी।
याची के ससुराल वालों ने उसके खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया था। याची पर आरोप था कि उसने एक नाबालिग का उत्पीड़न किया था।
कोर्ट ने पत्नी को परिवार के अन्य सदस्यों के साथ कोर्ट में तलब किया था। पत्नी ने कोर्ट को बताया कि याची पर लगाए गए आरोप निराधार हैं औऱ वह याची (पति) के साथ रहना चाहती है। पत्नी के बयान के बाद कोर्ट ने याची को अपनी पत्नी के साथ रहने की इजाज़त दे दी।
अपने आदेश में कोर्ट ने कहा कि दो बालिग़ लोगो के मानवीय संबंधो में किसी को भी हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है।
क्या है पूरा मामला ?
इस मामले में बाग़पत निवासी संदीप कुमार का आरोप था कि ससुराल वालों ने उसकी पत्नी को अवैध रूप से बंदी बना रखा है। दूसरी ओर याची के खिलाफ पॉक्सो एक्ट की धारा 4 सहित आई पी सी की धारा 376/328/354-C के तहत मुकदमा दर्ज करवाया गया था।
याची के अधिवक्ता का कहना था कि याची औऱ उसकी प्रेमिका दोनों बालिग़ हैं औऱ दोनों ने बाग़पत के शिव मंदिर में विवाह कर लिया था।
23 नवंबर 2021 को विवाह का पंजीकरण भी करवाया था। औऱ दोनों पति पत्नी के रूप में ख़ुशी से रह रहे थे। लेकिन 25 नवंबर 2021 को याची के ससुराल वाले उसकी पत्नी को ज़बरदस्ती लेकर चले गए थे तब से वह उनकी क़ैद में है।
याची की पत्नी ने 26 नवंबर 2021 को अपने परिवार के चार सदस्यों के खिलाफ बाग़पत जिला के बड़ौत थाना में आई पी सी की धारा 452, 380, 504, 506, 323 के तहत मुक़दमा दर्ज कराया था।
याची ने भी 1 जुलाई 2022 को बाग़पत के पारिवारिक न्यायालय में हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 9 के तहत मामला दर्ज कराया था।
कोर्ट ने 18 जुलाई 2022 को याची के ससुराल वालों को याची की पत्नी सहित कोर्ट में हाज़िर होने के आदेश दिए थे। लेकिन 22 जुलाई 2022 को दिल्ली के गोकुल पूरी थाना में याची के खिलाफ FIR ( संख्या 296 of 2022) दर्ज कर पॉक्सो एक्ट की धारा 4 सहित आई पी सी की धारा 376/3/354(C) के तहत मुकदमा दर्ज करवाया गया था।
हैबियस कार्पस याचिका में सुनवाई के दौरान पत्नी ने कोर्ट के सामने स्वीकार किया था कि वह बालिग़ है। औऱ उसने याची के साथ विवाह के बाद पंजीकरण करा लिया है। पत्नी ने स्वीकारा था कि हैबियस कार्पस याचिका में कोर्ट के 18 जुलाई 2022 के आदेश के बाद उसने अपने परिवार वालों की धमकी औऱ दबाओ में 22 जुलाई 2022 को याची के खिलाफ FIR ( संख्या 296 of 2022) दर्ज कर आई पी सी की विभिन्न धाराओं औऱ पॉक्सो एक्ट की धारा 4 के तहत मामला दर्ज कराया था। जिसमे याची को जेल जाना पड़ा था। उसने स्वीकार किया था कि FIR में दर्ज सभी आरोप निराधार थे।
पत्नी ने कोर्ट के सामने अपनी प्रस्तुति में कहा कि याची उसका पति है औऱ वह उसके साथ शांति से अपना वैवाहिक जीवन जीना चाहती है।
कोर्ट ने याची की अर्ज़ी को स्वीकार करते हुए उसे अपनी पत्नी के साथ रहने की इजाज़त दे दी।
क्या है हैबियस कार्पस (Habeas Corpus) ?
मानव अधिकारों की विभिन्न परंपराओं औऱ संविधान के अनुच्छेद 21 में परिकल्पित व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार सब से बुनियादी मानव अधिकारों में से एक है। हैबियस कार्पस (Habeas Corpus) जिसका शाब्दिक अर्थ है “शरीर को पेश करना” एक व्यक्ति की अवैध औऱ मनमानी हिरासत से सुरक्षा है।
संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट को हैबियस कार्पस याचिका जारी करने का अधिकार प्राप्त है। जबकि समस्त हाई कोर्ट्स को अनुच्छेद 226 के तहत इस याचिका को जारी करने का अधिकार प्राप्त है।
क्या कहती है हिन्दू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 9?
दांपत्य अधिकारों का प्रत्यास्थापन –
जबिक पति या पत्नी में से किसी ने युक्तियुक्त प्रतिहेतु के बिना दूसरे से अपना साहचर्य प्रत्याहत कर लिया है तब परिवेदित पक्षकार दाम्पत्य अधिकारों के प्रत्यास्थापन के लिए याचिका द्वारा आवेदन जिला न्यायालय में कर सकेगा औऱ न्यायालय ऐसी याचिका में किये गए कथनों की सत्यता के बारे में औऱ बात के बारे में आवेदन मंज़ूर करने का कोई वैध आधार नहीं है; अपना समाधान हो जाने पर दाम्पत्य अधिकारों के प्रत्यास्थापन के लिए आज्ञप्ति देगा।
स्पष्टीकरण – जहाँ प्रश्न यह उठता है कि क्या साहचर्य से प्रत्याहरण के लिए युक्तियुक्त प्रतिहेतु है, वहां युक्तियुक्त प्रतिहेतु साबित करने का भर उस व्यक्ति पर होगा जिसने साहचर्य से प्रत्याहरण किया है।
क्या कहती है पॉक्सो एक्ट की धारा 4 ?
प्रवेशन लैंगिक हमला के लिए दंड- जो कोई प्रवेशन लैंगिक हमला करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से जिसकी अवधि दस वर्ष से कम की नहीं होगी किन्तु जो आजीवन कारावास तक की हो सकेगी, दंडित किया जाएगा और जुर्माने से भी दंडनीय होगा।
केस टाइटल: संदीप कुमार औऱ अन्य बनाम स्टेट ऑफ़ यू पी औऱ 9 अन्य (HABEAS CORPUS WRIT PETITION No. – 536 of 2022)
आदेश यहाँ पढ़ें: