“दोषी दयालु था उसने पीड़िता को ज़िंदा रखा” मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने रेप के दोषी की कम की सजा

“दोषी दयालु था उसने पीड़िता को ज़िंदा रखा” मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने रेप के दोषी की कम की सजा

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर पीठ ने हाल ही में बलात्कार के एक दोषी की सजा को कम करने का आदेश दिया है।

निचली अदालत ने दुष्कर्म के आरोप में दोषी पाए जाने पर आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।

हाई कोर्ट ने यह कह कर कि दोषी ने पीड़िता को ज़िंदा छोड़ दिया वह काफी दयालु था उसके आजीवन कारावास को कम कर 20 साल की कठोर कारावास कर दिया है।

क्या है मामला –
इस मामले में अपीलकर्ता रामु को मध्य प्रदेश की एक निचली अदालत द्वारा एक चार साल की बच्ची के साथ बलात्कार का दोषी पाया गया था।

अपीलकर्ता के खिलाफ आई पी सी की धारा 342, 376, और एस सी एस टी एक्ट की धारा 3 (1) 12 के तहत मामला दर्ज किया गया था।

जांच के बाद साक्ष्यों के आधार पर अपीलकर्ता को दोषी पाया गया था। निचली अदालत ने आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।

निचली अदालत के आदेश को अपीलकर्ता ने हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।

अपीलकर्ता का पक्ष-
अपीलकर्ता की ओर से कहा गया था कि उसे मामले में झूठा फसाया गया है क्यूंकि अपीलकर्ता के खिलाफ कोई ठोस साक्ष्य नहीं था जो उसे अपराध से जोड़ता हो यहाँ तक कि अभियोजन पक्ष पीड़िता की एफ एस एल रिपोर्ट को भी रिकॉर्ड में नहीं लाया था।

अपीलकर्ता का तर्क था कि यह ऐसा केस नहीं है जिसमे उसे आजीवन कारावास की सजा दी जा सकती है।

इस तथ्य को सामने रखते हुए कि अपीलकर्ता अपनी हिरासत की तिथि अर्थात 31 मई 2007 से अब तक जेल में ही है और लगभग 15 साल कैद में गुज़ार चुका है, उसकी सजा को उसके द्वारा गुज़ारी गयी सजा तक कम कर दिया जाए।

प्रतिवादी का पक्ष-
प्रतिवादी पक्ष ने अपीलकर्ता की मांग का विरोध किया था। प्रतिवादी पक्ष का तर्क था कि निचली अदालत द्वारा साक्ष्य की सराहना में किसी प्रकार की त्रुटि नहीं है। अपीलकर्ता को दोषी पाया गया है, और वह सजा में किसी तरह की उदारता का योग्य नहीं है।

कोर्ट का फैसला –
जस्टिस सुबोध अभ्यंकर और जस्टिस सत्येंद्र कुमार सिंह की पीठ ने कहा कि निचली अदालत द्वारा साक्ष्य की सराहना में कोई त्रुटि नहीं है।

कोर्ट ने माना कि अपीलकर्ता के राक्षसी कृत्य पर विचार करते हुए जो महिला की गरिमा का सम्मान नहीं करता है और एक चार साल की बच्ची के साथ भी योन अपराध करने की प्रवत्ति का है इस कोर्ट को इस मामले में उपयुक्त नहीं लगता कि जहाँ सजा को पहले ही गुज़ारी गयी सजा तक कम किया जा सकता है।

कोर्ट ने कहा कि “इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि दोषी दयालु था उसने अभियोक्ता को ज़िंदा छोड़ दिया था कोर्ट के विचार में आजीवन कारावस को कम कर के 20 साल कठोर कारावस किया जा सकता है। “

कोर्ट ने अपीलकर्ता की मांग को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए उसकी आजीवन कारावास को 20 साल कठोर कारावास करने का आदेश दिया है।

केस टाइटल : रामु @ राम सिंह बनाम स्टेट ऑफ़ मध्य प्रदेश (Criminal Appeal No. 555 of 2009)

पूरा आदेश यहाँ पढ़ें –

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