बॉम्बे हाई कोर्ट ने अपनी पत्नी पर एच आई वी पॉज़िटिव का झूठा दावा करने वाले पति को तलाक़ की अनुमति देने से किया इंकार

बॉम्बे हाई कोर्ट ने अपनी पत्नी पर एच आई वी पॉज़िटिव का झूठा दावा करने वाले पति को तलाक़ की अनुमति देने से किया इंकार

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  • November 26, 2022
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बॉम्बे हाईकोर्ट ने हाल ही में अपनी पत्नी पर एच आई वी पॉज़िटिव होने का झूठा दावा करने वाले व्यक्ति को तलाक़ की अनुमति देने से इंकार कर दिया है।

जस्टिस नितिन जामदार और जस्टिस शर्मीला यु देशमुख की खंडपीठ ने यह आदेश आवेदक/ पति द्वारा पारिवारिक न्यायालय (पुणे) के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका की सुनवाई करते हुए दिया है।

क्या है पूरा मामला?
इस मामले में याची/ पति का विवाह प्रतिवादी/ पत्नी से 16 मार्च 2003 को हुआ था। विवाह के बाद प्रतिवादी/ पत्नी को टी बी हो गई थी, जिसका उपचार याची/ पति ने करवाया था।

याची का आरोप था कि प्रतिवादी गुस्सैल, सनकी और ज़िद्दी स्वाभाव की थी जिसके कारण याची को मानसिक पीड़ा का सामना करना पड़ा था।

दिसंबर 2004 में प्रतिवादी को उपचार के लिए हॉस्पिटल में भर्ती किया गया था जहाँ एच आई वी का परिक्षण पॉजिटिव आया था। इस के कारण याची/पति और उसके पारिवारिक सदस्यों को मानसिक पीड़ा पहुंची थी।

फिर फरवरी 2005 में प्रतिवादी/ पत्नी घर से चली गई और अपने वैवाहिक घर वापस नहीं आई थी।

बाद में जब प्रतिवादी/ पत्नी स्वस्थ हुई तो याची/ पति उसे अपने घर ले आया था,लेकिन याची की माँ प्रतिवादी की घर वापसी पर मानसिक रूप से परेशान थी। इस लिए याची ने प्रतिवादी को वापस अपने माता पिता के घर चले जाने को कहा था।

2 महीने बाद जब याची प्रतिवादी से मिलने गया तो उसने प्रतिवादी को अस्वस्थ पाया, इस लिए वह प्रतिवादी को उसके वैवाहिक घर वापस लाने को तैयार नहीं था।

याची को उसके एक जानकार डॉक्टर ने यह भी बताया था कि प्रतिवादी अभी भी एच आई वी पॉज़िटिव है। इस लिए याची ने विवश हो कर 16 मार्च 2003 को हुए विवाह को भंग करने की याचिका दायर की थी।

प्रतिवादी/ पत्नी ने याची/ पति द्वारा अपने खिलाफ लगाए गए सभी आरोपों को नाकारा था।

प्रतिवादी ने विशेष रूप से अपने लिखित बयान में एच आई वी परिक्षण की रिपोर्ट को निगेटिव बताया था।

प्रतिवादी का आरोप था कि एच आई वी परिक्षण निगेटिव होने के बावजूद याची ने उस पर एच आई वी पॉज़िटिव होने के आरोप लगाए थे और इसकी झूठी अफवाह प्रतिवादी के रिश्तेदारों और दोस्तों के बीच प्रचारित की थी।

प्रतिवादी का आरोप था कि उसके एच आई वी पॉज़िटिव होने की झूठी अफवाहों से उसे मानसिक पीड़ा पहुंची और उसका सामाजिक जीवन बर्बाद हो गया है।

उक्त कार्यवाही में प्रतिवादी ने घरेलु हिंसा से संरक्षण अधिनियम की धारा 12 के तहत आवेदन कर नुकसान स्वरुप 5 लाख रूपये और हड़पसर के आस पास एक वन बी एच के फ्लैट की मांग की थी।

याची पक्ष का तर्क –
याची पक्ष ने अपने तर्क में दो प्रस्तुति दी थी। पहली प्रस्तुति में इर्रीट्रीवेबल ब्रेकडाउन ऑफ मैरिज को आधार मान कर तलाक़ मांगी गई थी।

इर्रीट्रीवेबल ब्रेकडाउन ऑफ मैरिज की प्रस्तुति के समर्थन में याची पक्ष ने शीर्ष न्यायालय द्वारा दुर्गा प्रसन्ना त्रिपाठी बनाम अरुंधति त्रिपाठी (2005 7 SCC 353), नवीन कोहली बनाम नीतू कोहली AIR 2006 SCC 1675 सहित अन्य मामलों में दिए गए आदेशों पर भरोसा जताया था।

दूसरी प्रस्तुति में प्रतिवादी ने अपने उस जानकार डॉक्टर को गवाह बनाया था जिसने एच आई वी पॉज़िटिव होने को सिद्ध किया था।
याची पक्ष ने अपने तर्क में बस यही दो प्रस्तुति दी थी।

प्रतिवादी पक्ष का तर्क –
प्रतिवादी पक्ष का तर्क था कि याची द्वारा प्रतिवादी पर लगाए गए आरोप सिद्ध नहीं हुए थे।

प्रतिवादी पक्ष की प्रस्तुति थी कि याची ने उस हॉस्पिटल के डॉक्टर की जांच नहीं की थी जहाँ प्रतिवादी का अपने वैवाहिक घर में रहते हुए एच आई वी परिक्षण किया गया था जिस परिक्षण के आधार पर याची ने प्रतिवादी के एच आई वी पॉज़िटिव होने का दावा किया था, न ही साक्ष्य के रूप में याची ने रिपोर्ट प्रस्तुत की थी।

प्रतिवादी पक्ष का तर्क था कि क्रूरता के आरोप में याची की दलीलें अस्पष्ट और विवरण रहित है। याची ने खुद स्वीकार किया है कि जब वो प्रतिवादी को उसके वैवाहिक घर वापस लाया था तो याची की माँ के विरोध में उसने प्रतिवादी को अपने माता पिता के घर वापस जाने को कहा था।

कोर्ट ने माना कि इस मामले में याची द्वारा प्रतिवादी के खिलाफ लगाए गए आरोप सिद्ध नहीं हुए।

याची द्वारा प्रतिवादी पर डिजर्शन, एच आई वी पॉज़िटिव होने और क्रूरता के लगाए गए आरोप साबित नहीं हुए।

कोर्ट ने माना कि इस मामले में पारिवारिक न्यायालय का आकलन उचित परिप्रेक्ष्य में था।

कोर्ट ने माना कि पारिवारिक न्यायालय ने हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 (1)(i-a), (i-b), और (v) के तहत तलाक़ की मांग करने वाली याचिका को सही तरीके से ख़ारिज कर दिया था।

कोर्ट ने माना कि याची के आवेदन में कोई मेरिट नहीं है इस लिए उसे ख़ारिज किया जाता है।

केस टाइटल – प्रसन्ना कृश्नाजी मुसाले बनाम नीलम प्रसन्ना मुसाले फैमली कोर्ट अपील संख्या 86/ 2011

पूरा आदेश यहाँ पढ़ें –

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