सजा देने से पहले आरोपी की परिस्थितियों पर भी हो विचार, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने रेप के दोषी की मौत की सजा को कम करने का दिया आदेश

सजा देने से पहले आरोपी की परिस्थितियों पर भी हो विचार, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने रेप के दोषी की मौत की सजा को कम करने का दिया आदेश

इलाहबाद हाई कोर्ट ने हाल ही में निचली अदालत द्वारा एक दस साल की बच्ची के साथ बलात्कार और हत्या के दोषी की मौत की सजा को कम कर आजीवन कारावास किये जाने का आदेश दिया है।

जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रेनू अग्रवाल की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए दोषी की सजा कम करने का आदेश दिया है।

पीठ ने कहा था कि अपराध के समय दोषी मात्र 20 साल का युवा था और अब 29 साल की उम्र में उस पर पत्नी और बच्चों की ज़िम्मेदारी है।

क्या है मामला –
इस मामले में जमुना प्रसाद ने इनायत नगर पुलिस स्टेशन जिला फैज़ाबाद में 29 जनवरी 2013 को शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायतकर्ता ने कहा था कि उसकी 10 साल की भांजी सुबह स्कूल गयी थी और उसके बाद घर वापस नहीं आई थी। तलाश करने पर बच्ची का मृत शरीर एक खेत में मिला था। बाद में इनायत नगर पुलिस स्टेशन में दी गयी लिखित शिकायत के आधार पर उसी दिन अर्थात 29 जनवरी को कुछ अज्ञात लोगों के खिलाफ आई पी सी की धारा 302 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था।

जांच के दौरान दोषी/ अपीलकर्ता का नाम सामने आया था। दोषी/ अपीलकर्ता के खिलाफ आई पी सी की धारा 376 और 302 में आरोप तय किये गए थे।

इस मामले में निचली अदालत ने ट्रायल के बाद आरोपी को आई पी सी की धारा 376 और 302 के तहत दोषी पाया था। और 17 मई 2018 को आई पी सी की धारा 376 के तहत आजीवन कारावास और धारा 302 के तहत मृत्यु दंड देने का आदेश दिया था।

निचली अदालत के इसी फैसले को अपीलकर्ता ने हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।

अपीलकर्ता का पक्ष –
अपीलकर्ता के अधिवक्ता ने निचली अदालत के आदेश को अनुचित और तथ्यों के विपरीत बताया था। अपीलकर्ता को बेकुसूर बताया गया था और कहा गया था कि इस मामले में उसे राजीनीतिक प्रतिद्वंद्विता के कारण फसाया गया है।

अपीलकर्ता का नाम FIR में नहीं था। अपीलकर्ता की ओर से तर्क दिया गया था कि यह मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित है और परिस्थितियों की कड़ियाँ अधूरी थीं। अपीलकर्ता के पास से ज़ब्त किये गए साक्ष्यों की एफ एस एल रिपोर्ट को रिकॉर्ड में नहीं लाया गया था।

अपीलकर्ता के अधिवक्ता ने तर्क दिया था कि मामले में तथ्य के सारे गवाह मृतका के संबंधी हैं इस लिए वह अत्यंत हितकारी गवाह हैं ऐसे में उनके साक्ष्यों पर विश्वास नहीं किया जा सकता है। अपीलकर्ता ने हाई कोर्ट से निचली अदालत के फैसले को रद्द करने की मांग की थी।

प्रतिवादी का पक्ष –
प्रतिवादी पक्ष ने कोर्ट को बताया था कि पीड़िता एक दस साल की बच्ची थी। जब वह स्कूल जा रही थी तो अपीलकर्ता ने उसे गोद में उठा लिया था और गन्ने के खेत में ले जाकर उसका बलात्कार किया था और बेरहमी से उसकी हत्या कर दी थी। पीड़िता का गला उसके दुपट्टे से ही जिसे उसने स्कूल जाते अपने सर पर पहना था घोंट दिया गया था।

प्रतिवादी पक्ष का तर्क था कि यह मामला दुर्लभ से दुर्लभ की श्रेणी में आता है जहाँ अपीलकर्ता ने एक दस की बच्ची का बलात्कार करने के बाद हत्या कर दी थी।

प्रतिवादी पक्ष ने कोर्ट को बताया था कि निचली अदालत का फैसला नेत्र और दस्तावेज़ी साक्ष्यों के आधार पर था इसलिए निचली अदालत का फैसला टिकाऊ है और उसे बरक़रार रहना चाहिए।

कोर्ट ने कहा कि यह एक परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित मामला है। और ऐसे मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने साक्ष्यों की सराहना में आदेशों के माध्यम से दिशानिर्देश दे रखे हैं। हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा पूर्व में दिए गए आदेशों का हवाला देते हुए आपराधिक मामलों में परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की सराहना में दिए गए दिशानिर्देशों के पालन की इस मामले में पृष्टि की थी।

कोर्ट ने कहा कि मनोज और अन्य बनाम स्टेट ऑफ़ मध्य प्रदेश,2022 लाइव लॉ (SC) 510 में सुप्रीम कोर्ट ने हनुमंत बनाम स्टेट ऑफ़ मध्य प्रदेश के हवाले से माना था कि परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के मामलों में निचली अदालतों का सही दृष्टिकोण सिर्फ इस बात पर केंद्रित होना चाहिए के सारे स्थापित तथ्य सिर्फ आरोपी के अपराध से सुसंगत हैं। इसी मामले में कोर्ट ने परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के बारे में शरद बिरदी चंद सारदा बनाम स्टेट ऑफ़ महाराष्ट्र में कोर्ट द्वारा स्थापित किये गए 5 गोल्डन सिद्धांतों का उल्लेख किया था।

जहाँ तक “अंतिम बार देखा गया” सिद्धांत का संबंध है सुप्रीम कोर्ट ने स्टेट ऑफ़ यू पी बनाम सतीश (2005) 3 SCC, दुर्योधन राउत बनाम स्टेट ऑफ़ उड़ीसा 2014 (86) ACC 574, पूर्ण चंद्र कुसल बनाम स्टेट ऑफ़ उड़ीसा 2012 (78) ACC 957, में माना था कि आरोपी और मृतक के अंतिम बार एक साथ जीवित दिखने और जब मृतक को मरा पाया गया हो के बीच समय अंतराल इतना कम हो कि आरोपी के अलावा किसी अन्य के अपराध को अंजाम देने की संभावना असंभव हो जाती हो।

हाई कोर्ट ने माना कि इस मामले में अभियोजन द्वारा दिए गए सभी साक्ष्य “अंतिम बार देखा गया” के सिद्धांत की पृष्टि करते हैं।

कोर्ट ने कहा कि जहाँ तक उद्देश्य का संबंध है परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के मामले में अभियोजन को अपराध का उद्देश्य सिद्ध करना पड़ता है लेकिन यौन हमलों से संबंधित अपराधों में इसका महत्त्व ख़त्म हो जाता है।

उद्देश्य आरोपी के मन में होता है जिसे अभियोजन पक्ष हमेशा सिद्ध नहीं कर सकता है।

स्पष्ट है कि दोषी / अपीलकर्ता ने अपनी वासना की संतुष्टि के लिए एक 10 साल की लड़की का बलात्कार किया था और अपने खिलाफ साक्ष्य को दबाने के लिए उसने उसकी हत्या कर दी थी।

कोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्टेट ऑफ़ यू पी बनाम कृष्णपाल 2008, (16) SCC 73 , श्रीअजि गेनु मोहिते बनाम स्टेट ऑफ़ महाराष्ट्र 1973 सुप्रीम कोर्ट 55, अमितव बनर्जी @ अमित @ बाप्पा बनर्जी बनाम स्टेट ऑफ़ वेस्ट बंगाल ए आई आर 2011 सुप्रीम कोर्ट 2193 में दिए गए निर्णयों से स्पष्ट है कि परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के मामले में “उद्देश्य” का महत्त्व होता है और यह परिस्थितियों की कड़ी में एक लिंक होता है लेकिन उद्देश्य प्रदान करने की विफलता अपने आप में घातक नहीं है।

इस मामले में अभियोजन ने एक पूरी कड़ी को सिद्ध किया था जिसका निष्कर्ष सिर्फ यही था कि दोषी /अपीलकर्ता ने ही अपराध को अंजाम दिया था।

जहाँ तक “हितकारी गवाहों” का संबंध है कोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने कार्तिक मल्हार बनाम स्टेट ऑफ़ बिहार (1996) 1 SCC 614, में माना था कि “गवाहों के साक्ष्य को केवल इसलिए नज़रअंदाज नहीं जा सकता क्योंकि वह पीड़ित का निकट संबंधी है।”

कोर्ट ने कहा कि इस तर्क में कोई दम नहीं है। यह अच्छी तरह से स्थापित कानून है कि संबंधी गवाह के साक्ष्य को सिर्फ इस लिए नहीं नकारा जा सकता है कि वह शिकायतकर्ता का संबंधी है अगर उसका साक्ष्य ठोस, स्वतंत्र, निष्पक्ष और संगत है।

कोर्ट ने माना कि उसके विचार में निचली अदालत द्वारा अपीलकर्ता को दोषी ठहराना सही था। लेकिन निचली अदालत द्वारा अपीलकर्ता को आई पी सी की धारा 302 के तहत मृत्यु दंड की सजा पर कोर्ट ने कहा कि आजीवन कारावास नियम है और मृत्यु दंड अपवाद है।

कोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने बचन सिंह बनाम स्टेट ऑफ़ पंजाब ए आई आर 1980 एस सी 898, मच्छी सिंह बनाम स्टेट ऑफ़ पंजाब (1983) 3 एस सी सी 470 , और रामनरेश बनाम स्टेट ऑफ़ छत्तीसगढ़ (2012) 4 SCC 257 में माना है कि दुर्लभ से दुर्लभ सिद्धांत को लागु करने करने के लिए बचन सिंह मामले में निर्धारित 13 उत्तेजिक और 7 शांत परिस्थितयों पर विचार करना आवश्यक है।

कोर्ट ने कहा कि धर्मदेव यादव बनाम स्टेट ऑफ़ यू पी (2014) 5 एस सी सी 509 में सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि अपराध को अंजाम देने के तरीके के संबंध में किसी साक्ष्य के अभाव में मामला दुर्लभ से दुर्लभ की श्रेणी में नहीं आता है।

कालू खान बनाम स्टेट ऑफ़ राजस्थान (2015) 16 एस सी सी 492 के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मृत्यु दंड की सजा को कम कर आजीवन कारावास करने में अपीलकर्ता / दोषी की उम्र, सामाजिक-आर्थिक स्थिति, हिरासत में उसके व्यवहार पर विचार किया था और यह कि मामला पूरी तरह से परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर आधारित था।

हाई कोर्ट ने माना कि दोषी/अपीलकर्ता का अपराध घिनौना, शातिर और क्रूर स्वभाव का है और समाज पर कलंक का कारण बना है लेकिन सजा देने से पहले हमें आरोपी की परिस्थितियों को भी देखना है।

अपराध करने के समय वह 20 साल का था। अब उसकी पत्नी और बच्चे हैं। इस बात के साक्ष्य नहीं हैं कि उसके आचरण में सुधार की संभावना नहीं है। निचली अदालत को ऐसा साक्ष्य नहीं मिला कि वह पेशावर अपराधी है। निचली अदालत में उसकी अपराधिक पृष्ठभूमि के बारे में कुछ नहीं कहा गया है।

कोर्ट ने कहा इन तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार करने के बाद हमारी राय है कि अभियोजन ने परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की कड़ी में हर लिंक को पर्याप्त रूप से स्थापित किया है लेकिन यह मामला दुर्लभ से दुर्लभ की श्रेणी में नहीं आता है जिस में मृत्य दंड दिया जाए। उल्लेख उचित होगा कि मृत्यु दंड अपवाद है सिर्फ उस सूरत में जब आजीवन कारावास अपराध के लिए अपर्याप्त होता है।

इस लिए दोषी को आई पी सी की धारा 302 के तहत दी गयी मृत्यु दंड की सजा को आजीवन कारावास किया जाता है।

केस टाइटल- गोविन्द पासी बनाम स्टेट ऑफ़ यू पी (CRIMINAL APPEAL No. – 1004 of 2018)

आदेश यहाँ पड़ें –

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